poetry

प्रेमिका

प्रेमिका: इम्तेहान-ए-ज़िन्दगी की राह में,

आज उड़ने को जी चाहता है,

मेरे पांव टिक नहीं रहे ज़मीन पर,

ज़रा हाथ थाम लो।

कवि
: तुम हाथ थामने की बात करती हो,

मैं तो वो पंख ला दूंगा मोहब्बत का, 

के आकाश नीचे आ तुम्हारे पांव के इशारों पर झूमे।

प्रेमिका
: ये जो तुम कवि बन, 

सपनों की दुनिया में ले चलते हो,

इश्क़ में खौफ पैदा हो जाता है,

सिर्फ हाथ थामने को कहा था,

प्राकटिकल इश्क़ नहीं होता तुमसे?

कवि
: हाहाहा! तुम भी अजीब हो,

शायद इसीलिए साथ हो,

नज़रें झुका दूर न जाओ,

करीब आओ, इज़हार-ए-इश्क़ जो तुमसे करना है।

प्रेमिका: आज, तुम फूलों को देखो और मेरे झुमके से गुफ्तगू करो,

नज़र नहीं मिलाऊंगी आज,

इकरार-ए-इश्क़ जो तुमसे करना है।

कवि: प्रिय, तुम पूनम के चांद की रोशनी बन इकरार कर दूर जा रही हो,

नज़र न मिला फिर वही अमावस्या की रात बन मेरी कल्पना होती जा रही हो..

सूर्योदय हो गया है।

Images courtesy: Royale Frames

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